FIR से पहले हिरासत पर हाईकोर्ट सख्त, UP पुलिस से कहा- कानून से ऊपर कोई नहीं

FIR से पहले हिरासत पर हाईकोर्ट सख्त, UP पुलिस से कहा- कानून से ऊपर कोई नहीं
हाइलाइट्स
• FIR से पहले हिरासत पर हाईकोर्ट सख्त
• पुलिस की कार्रवाई को बताया गैरकानूनी
• DGP को पुलिस ट्रेनिंग सुधारने का निर्देश

उत्तर प्रदेश पुलिस की गिरफ्तारी प्रक्रिया पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। गौतम बुद्ध नगर में एक व्यक्ति को FIR दर्ज होने से पहले हिरासत में रखने और जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं करने के मामले में अदालत ने दीपक की हिरासत को गैरकानूनी घोषित कर दिया। साथ ही, उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने पुलिस की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ऐसे मामले बार-बार सामने आ रहे हैं, जिनमें कानून की अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जा रहा। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस को भी कानून के दायरे में रहकर काम करना होगा।

FIR से पहले हिरासत में लिए जाने पर अदालत ने उठाए सवाल

यह मामला गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) में 23 अगस्त 2026 को दो पक्षों के बीच हुई हिंसा से जुड़ा है। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, दीपक और चार अन्य लोगों को उसी दिन शाम 7:34 बजे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126, 135 और 170 के तहत हिरासत में लिया गया था।

इसके बाद रात 9:39 बजे FIR दर्ज की गई। पुलिस रिकॉर्ड में दीपक की औपचारिक गिरफ्तारी 24 अगस्त को दोपहर 2:57 बजे दिखाई गई। अदालत ने इस समयक्रम को महत्वपूर्ण माना, क्योंकि रिकॉर्ड के अनुसार दीपक FIR दर्ज होने से पहले ही पुलिस हिरासत में था।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि निवारक कार्रवाई के लिए BNSS की धाराओं 126 और 130 के तहत जरूरी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था।

गिरफ्तारी के दस्तावेजों में मिलीं कई गड़बड़ियां

अदालत ने गिरफ्तारी से जुड़े कागजात की जांच में भी विसंगतियां पाईं। गिरफ्तारी के आधार में स्पष्ट जानकारी देने के बजाय FIR और साक्ष्यों पर आधारित सामग्री का सामान्य उल्लेख किया गया था। इसके अलावा, विवेचक के हस्ताक्षर और दस्तावेजों में दर्ज तारीखों के बीच भी अंतर मिला।

व्यक्तिगत तलाशी और जब्ती से जुड़े दस्तावेजों पर 23 अगस्त की तारीख दर्ज थी, जबकि दीपक की औपचारिक गिरफ्तारी 24 अगस्त को दिखाई गई थी।

पांच जगह तारीखों में मिली विसंगति

हाईकोर्ट के मुताबिक, तारीखों से जुड़ी गड़बड़ियां पांच जगह सामने आईं। हालांकि, इन्हें विधिवत ठीक करने या प्रमाणित करने का स्पष्ट आधार नहीं मिला।

निवारक कार्रवाई के दस्तावेजों में बॉन्ड की राशि खाली थी। संबंधित अधिकारी के हस्ताक्षर, तारीख और समय जैसी जरूरी जानकारियां भी दर्ज नहीं थीं। BNSS की धारा 130 के तहत जारी नोटिस में अधिकारियों के नाम और हस्ताक्षर को लेकर भी विसंगतियां मिलीं।

इन परिस्थितियों के आधार पर अदालत ने आशंका जताई कि संबंधित दस्तावेज बाद में भरे गए हो सकते हैं और याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर खाली कागज पर लिए गए हों।

तनावपूर्ण हालात का हवाला देने पर अदालत की टिप्पणी

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि घटनास्थल पर तनावपूर्ण स्थिति थी और भीड़ मौजूद थी। शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस ने सद्भावना में कार्रवाई की थी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि तनावपूर्ण परिस्थितियां भी पुलिस को कानून का पालन करने से छूट नहीं देतीं। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े कानूनी सुरक्षा उपाय नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत मिले अधिकारों से जुड़े हैं।

खंडपीठ ने जोर दिया कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार या हिरासत में लेने से पहले कानून में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य है।

पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर नाराजगी

हाईकोर्ट ने सहायक पुलिस आयुक्त कमलेश कांत और विवेचक अनुज कुमार की कार्यप्रणाली पर भी कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने BNSS की प्रक्रियाओं की जानकारी और कानूनी प्रावधानों के प्रति लापरवाह रवैये पर नाराजगी जताई।

मामले में पुलिस के दस्तावेजों की पर्याप्त जांच नहीं करने को लेकर मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए। अदालत ने निर्देश दिया कि कमलेश कांत और अनुज कुमार के खिलाफ की गई नाराजगी संबंधी टिप्पणियां दोनों अधिकारियों की सर्विस बुक में दर्ज की जाएं।

DGP को पुलिस प्रशिक्षण में सुधार के निर्देश

खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) से पुलिसकर्मियों के प्रशिक्षण मॉड्यूल को बेहतर बनाने को कहा। अदालत ने नागरिक स्वतंत्रता और गिरफ्तारी तथा हिरासत से जुड़े कानूनी प्रावधानों के प्रति पुलिसकर्मियों को संवेदनशील बनाने पर जोर दिया।

हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि भविष्य में किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक थाने में रखने और बाद में छोड़ देने जैसी कार्रवाई को केवल प्रक्रिया की जानकारी न होने के आधार पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।

अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण माना जाएगा, जब तक पुलिस इसके विपरीत निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त सामग्री पेश न करे।

दीपक की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार

दीपक की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने उसकी हिरासत को गैरकानूनी घोषित किया और तत्काल रिहाई का आदेश दिया। यह आदेश इस शर्त के साथ है कि दीपक किसी अन्य मामले में वांछित न हो।

अदालत की टिप्पणियों और निर्देशों में गिरफ्तारी की प्रक्रिया, नागरिक स्वतंत्रता तथा पुलिस की कानूनी जवाबदेही पर जोर दिया गया है।