- अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत
- सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी को सात सीटों का नुकसान
- अब्दुल अल सैयद बने अमेरिकी इतिहास के पहले मुस्लिम सीनेटर
- ओहायो में ट्रंप समर्थित विवेक रामास्वामी को मिली हार
- महंगाई और ईरान युद्ध ने बढ़ाई ट्रंप की मुश्किलें
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US Midterm Elections 2026, Donald Trump Election Defeat: अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। तीन नवंबर को हुए मतदान के नतीजों में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (प्रतिनिधि सभा) दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है। इसके साथ ही ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती दो वर्षों में अमेरिकी संसद पर कायम रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण खत्म हो गया है। चुनाव परिणामों ने अमेरिकी राजनीति में सत्ता का समीकरण बदल दिया है। रिपब्लिकन पार्टी को सीनेट में सात सीटों का नुकसान हुआ है, जबकि टेक्सास, कंसास, आयोवा, ओहायो और दक्षिण कैरोलिना जैसे राज्यों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों ने उल्लेखनीय जीत दर्ज की है। गवर्नर चुनावों में भी कई राज्यों में सत्ता परिवर्तन हुआ है। इस नतीजे को ट्रंप की नीतियों और उनके नेतृत्व के खिलाफ जनता की नाराजगी के तौर पर देखा जा रहा है।
ट्रंप की हार के पीछे कई बड़े कारण
मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार के पीछे कई मुद्दे अहम माने जा रहे हैं। इनमें ईरान युद्ध, बढ़ती महंगाई, ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति, रोजगार को लेकर चिंता और कमजोर उम्मीदवारों का चयन प्रमुख हैं। विदेश नीति के मोर्चे पर ईरान के साथ तनाव और युद्ध की परिस्थितियों ने भी अमेरिकी मतदाताओं के बीच असंतोष बढ़ाया। चुनाव परिणामों के बाद ईरान के तेवर बदलने की बात भी सामने आ रही है। हालांकि, दोनों देशों के संबंधों में किसी बड़े बदलाव का आकलन करने के लिए आगे के घटनाक्रम पर नजर रखनी होगी।
दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी की बढ़त
अमेरिकी कांग्रेस के उच्च सदन सीनेट में डेमोक्रेट्स ने सात सीटों का इजाफा कर बहुमत हासिल किया है। 100 सदस्यीय सीनेट में बहुमत के लिए 51 सीटों की जरूरत होती है। चुनाव के बाद डेमोक्रेट्स और उनके साथ गठबंधन वाले निर्दलीय सदस्यों की संख्या 54 तक पहुंच गई है। रिपब्लिकन पार्टी 44 सीटों पर सिमट गई है। 35 सीटों पर चुनाव हुए थे, जिनमें दो विशेष चुनाव भी शामिल थे।
वहीं, 435 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में भी डेमोक्रेट्स ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है। शुरुआती नतीजों में पार्टी को कम से कम 231 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि रिपब्लिकन पार्टी 141 सीटों के आसपास है। कई सीटों पर मतगणना जारी रहने के कारण आंकड़ों में बदलाव संभव है। इन नतीजों ने ट्रंप प्रशासन के लिए संसद में अपनी नीतियों को पारित कराना मुश्किल कर दिया है।
भारतवंशी उम्मीदवारों की जीत, अब्दुल अल सैयद बने सीनेटर
इन चुनावों में भारतीय मूल के कई उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। हालांकि, ट्रंप के करीबी माने जाने वाले विवेक रामास्वामी को ओहायो में हार का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर मिशिगन से डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल अल सैयद ने सीनेट का चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया। वह अमेरिकी इतिहास में सीनेटर चुने जाने वाले पहले मुस्लिम बन गए हैं। उनकी जीत को अमेरिकी राजनीति में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
गवर्नर चुनावों में भी डेमोक्रेट्स को फायदा
कांग्रेस के दोनों सदनों के अलावा गवर्नर चुनावों में भी डेमोक्रेटिक पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया है। 36 राज्यों में गवर्नर पद के लिए चुनाव हुए। कई ऐसे राज्यों में डेमोक्रेट्स ने जीत दर्ज की, जहां पहले रिपब्लिकन पार्टी का दबदबा था। इससे राज्य स्तर पर भी ट्रंप की पार्टी को नुकसान पहुंचा है। चुनाव परिणामों के शुरुआती आकलन के मुताबिक, डेमोक्रेट्स ने कई अहम गवर्नर पदों पर कब्जा जमाया है।
क्या है अमेरिका का 'मिडटर्म कर्स'?
अमेरिकी राजनीति में एक दिलचस्प परंपरा को 'मिडटर्म कर्स' यानी मध्यावधि चुनाव का अभिशाप कहा जाता है। इसका मतलब है कि राष्ट्रपति की पार्टी को कार्यकाल के बीच होने वाले चुनावों में अक्सर नुकसान उठाना पड़ता है। वर्ष 1946 से 2022 तक हुए 20 मध्यावधि चुनावों में 18 बार राष्ट्रपति की पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में अपनी सीटें गंवाई हैं। यानी करीब 90 फीसदी चुनावों में सत्तारूढ़ दल को नुकसान हुआ। केवल 1998 में बिल क्लिंटन और 2002 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में उनकी पार्टियां प्रतिनिधि सभा में सीटें बढ़ाने में सफल रही थीं। इस बार ट्रंप भी इस राजनीतिक परंपरा से बच नहीं सके।
ट्रंप के लिए आगे की राह होगी मुश्किल
दोनों सदनों में बहुमत गंवाने के बाद ट्रंप के लिए अपने दूसरे कार्यकाल के शेष दो वर्षों में विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाना चुनौतीपूर्ण होगा। डेमोक्रेट्स अब सरकार के विधेयकों को रोकने, प्रशासनिक नियुक्तियों पर सवाल उठाने और सरकारी कामकाज की जांच कराने की स्थिति में होंगे। चुनाव परिणामों ने यह भी संकेत दिया है कि अमेरिकी मतदाता आर्थिक स्थिति, महंगाई और विदेश नीति जैसे मुद्दों पर राष्ट्रपति के प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं हैं।