महात्मा बुद्ध ने जिस स्थान पर अपना पहला उपदेश दिया था उस स्थान को यूनेस्को UNESCO ने विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया है।
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित ऐतिहासिक बौद्ध तीर्थ स्थल सारनाथ को दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित UNESCO विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में आधिकारिक तौर पर विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
लगभग 28 वर्षों के इंतजार के बाद मिली इस मान्यता के साथ सारनाथ भारत का 45वां और उत्तर प्रदेश का चौथा विश्व धरोहर स्थल बन गया है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस उपलब्धि को हर भारतीय के लिए गर्व का पल क़रार दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखे एक पोस्ट में कहा, ‘इस बात की खुशी है कि उत्तर प्रदेश के सारनाथ को UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है।’
प्रधानमंत्री ने कहा कि सारनाथ का भगवान बुद्ध से गहरा नाता है। ज्ञान, करुणा और सद्भाव का उनका कालातीत संदेश दुनिया को प्रेरित करता है।
उन्होंने कहा कि यह सम्मान भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का जश्न है। इससे दुनिया भर के और भी लोग सारनाथ आने और भगवान बुद्ध के आदर्शों से जुड़ने के लिए प्रेरित होंगे।
सारनाथ में बौद्ध स्तूप, मूलगंध कुटी विहार के साथ ही अशोक की वह लाट भी है जिसकी तस्वीर भारतीय मुद्रा पर अंकित की जाती है। अशोक की लाट यहां संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। पहले यह स्तंभ खुले में स्थापित था लेकिन राष्ट्रीय धरोहर की सुरक्षा की लिहाज़ से इसे संग्रहालय में स्थानान्तरित कर दिया गया था।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस उपलब्धि पर खुशी जताई है। शाह ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में कहा, ‘आज हमारा सांस्कृतिक गौरव और भी बढ़ गया है क्योंकि उत्तर प्रदेश के सारनाथ को UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है।’
शाह ने कहा कि भगवान बुद्ध से जुड़ी भारत की प्राचीन विरासत को मिली यह मान्यता उनके तेजस्वी ज्ञान को और अधिक लोगों तक पहुँचाएगी और उन्हें एक बेहतर दुनिया के लिए शांति और ज्ञानोदय के आदर्शों को अपनाने के लिए प्रेरित करेगी।
सारनाथ के दो मुख्य हिस्से
सारनाथ के दो मुख्य हिस्से हैं – चौखंडी स्तूप और सारनाथ के पुरातात्विक अवशेष जिनमें धमेख स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, मूलगंधकुटी विहार, अशोक स्तंभ, आदि शामिल हैं। ये दोनों हिस्से मिलकर सारनाथ की प्राचीन जगह के आर्किटेक्चरल और पुरातात्विक अवशेषों को सुरक्षित रखते हैं। बौद्ध परंपरा में इस जगह को अलग-अलग नामों से जाना जाता है – ऋषिपत्तन, इषिपत्तन, मृगदाव। ये सभी नाम एक पवित्र जगह की ओर इशारा करते हैं, जहाँ छठी शताब्दी ईसा पूर्व में बुद्ध आए थे और उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया था, जिसे "धर्मचक्र प्रवर्तन" के नाम से जाना जाता है। इसी घटना से बौद्ध संघ की शुरुआत हुई और 'आर्य अष्टांगिक मार्ग' (Noble Eightfold Path) के सिद्धांतों की स्थापना हुई।
बौद्ध तीर्थयात्रा की चार मुख्य जगहों में एक
बुद्ध ने खुद इसे बौद्ध तीर्थयात्रा की चार मुख्य जगहों में से एक बताया था। सारनाथ का विकास सदियों तक शाही, मठवासी और आम लोगों के संरक्षण से हुआ। गौतम बुद्ध के पहले उपदेश की जगह और जहाँ वे अपने पहले शिष्यों से मिले थे, उसके आस-पास कई स्तूप, मंदिर और विहार बनाए गए। 12वीं शताब्दी ईस्वी में गिरावट और उसके बाद हुई तबाही के कारण यह जगह गुमनामी में चली गई। 18वीं शताब्दी में इसे फिर से खोजा गया।
इस जगह पर प्राचीन स्मारकों का एक समूह है जो पूर्व-मौर्य काल (5वीं-चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) से लेकर 12वीं शताब्दी ईस्वी में सारनाथ के विनाश तक बनाए गए थे।
सारनाथ में ASI ने सबसे ज़्यादा खुदाई की
सारनाथ उन जगहों में से एक है जहाँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने सबसे ज़्यादा खुदाई की है। इसके परिणामस्वरूप 16 सदियों तक फैली हुई अलग-अलग समय की बस्तियों के प्रमाण मिले हैं।
सारनाथ को 'वर्ल्ड हेरिटेज प्रॉपर्टी' (विश्व धरोहर स्थल) घोषित किए जाने के बाद, बौद्ध धर्म के चार सबसे अहम तीर्थ स्थलों में से तीन - लुम्बिनी (नेपाल), महाबोधि मंदिर, बोधगया (बिहार) और अब सारनाथ (उत्तर प्रदेश) - विश्व धरोहर में शामिल हो गए हैं। इनके साथ ही कई अन्य महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल भी इसमें शामिल हैं, जैसे सांची, नालंदा, अजंता (तीनों भारत में), अनुराधापुर (श्रीलंका), पहाड़पुर (बांग्लादेश), तक्षशिला और तख्त-ए-बाही (दोनों आज के पाकिस्तान में) आदि।
यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज प्रॉपर्टी के तौर पर सारनाथ
सारनाथ के प्राचीन स्थल को 1998 में विश्व धरोहर की 'टेंटेटिव लिस्ट' (संभावित सूची) में शामिल किया गया था। इस स्थल को विश्व धरोहर की सूची में शामिल करने का प्रस्ताव जनवरी 2025 में 'वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी' के विचारार्थ भेजा गया था। सलाहकार निकायों के साथ कई तकनीकी बैठकों और स्थल की समीक्षा के लिए ICOMOS मिशन के दौरे जैसी अठारह महीने लंबी और गहन प्रक्रिया के बाद, आज शाम दक्षिण कोरिया के बुसान में वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी के सदस्यों ने यह ऐतिहासिक फैसला लिया।