वैश्विक व्यवस्था का संकट और भारतीय दृष्टिकोण: अंतरराष्ट्रीय संबंधों की नई दिशा

Authored By: News Corridors Desk | 18 Mar 2026, 05:47 PM
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वर्तमान वैश्विक व्यवस्था एक गहरे वैचारिक और संरचनात्मक संकट से गुजर रही है। पिछले लगभग 300 वर्षों से अंतरराष्ट्रीय राजनीति जिस वेस्टफेलियाई राज्य-व्यवस्था पर आधारित मानी जाती है, वह आज कई चुनौतियों का सामना कर रही है। संप्रभु राष्ट्र, शक्ति-संतुलन और नियम-आधारित व्यवस्था के दावे होने के बावजूद दुनिया में संघर्ष, असुरक्षा और अविश्वास लगातार बढ़ रहे हैं। यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संकट, बढ़ता परमाणु खतरा और आर्थिक प्रतिस्पर्धा इस बात के संकेत हैं कि वर्तमान व्यवस्था शांति और स्थिरता पूरी तरह सुनिश्चित नहीं कर पा रही है।

यह समस्या केवल राजनीति या कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बौद्धिक कारण भी है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन मुख्यतः यूरोप के अनुभवों पर आधारित है। 1648 की वेस्टफेलिया संधि, औपनिवेशिक विस्तार और शीत युद्ध की राजनीति के आधार पर सिद्धांत बनाए गए और धीरे-धीरे उन्हें पूरे विश्व के लिए सही मान लिया गया।

इसके कारण अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन यूरो-केंद्रित बन गया। एशिया, अफ्रीका और अन्य सभ्यताओं के अनुभव और विचार इस चर्चा में पीछे रह गए। इससे एक तरह की सोच विकसित हुई, जिसमें पश्चिमी दृष्टिकोण को ही मानक मान लिया गया।

पश्चिमी सिद्धांतों में मुख्यतः तीन धाराएँ हैं—यथार्थवाद, उदारवाद और संरचनावाद। यथार्थवाद के अनुसार दुनिया अराजक है और हर देश अपनी सुरक्षा के लिए शक्ति बढ़ाता है। इसमें “Survival of the Fittest” और “Balance of Power” जैसे विचार महत्वपूर्ण हैं।

उदारवाद सहयोग और संस्थाओं पर जोर देता है, जबकि संरचनावाद विचारों और पहचान की भूमिका को महत्व देता है। फिर भी, इन सभी सिद्धांतों में शक्ति और सुरक्षा ही केंद्र में रहते हैं। नैतिकता, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक मूल्यों को कम महत्व दिया जाता है।

इसी वजह से ये सिद्धांत कई महत्वपूर्ण सवालों का जवाब नहीं दे पाते। जैसे—नेता का नैतिक चरित्र विदेश नीति को कैसे प्रभावित करता है? क्या सत्ता केवल शक्ति पर आधारित होनी चाहिए या उसके पीछे नैतिक आधार भी होना चाहिए? जीत के बाद न्याय और संयम कैसे बनाए रखें? इन सवालों के स्पष्ट उत्तर पश्चिमी सिद्धांतों में कम मिलते हैं।

इसके विपरीत, भारतीय शास्त्रीय परंपरा राजनीति को नैतिक दृष्टि से देखती है। यहाँ राज्य केवल शक्ति का साधन नहीं, बल्कि समाज के कल्याण का माध्यम है। भारतीय दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार पुरुषार्थों के संतुलन को आदर्श माना गया है। इसलिए भारतीय सोच में राज्य का उद्देश्य केवल अपनी रक्षा करना नहीं, बल्कि समाज के हित की रक्षा करना भी है। इसे “लोकसंग्रह” कहा गया है, यानी सभी के हित और संतुलन को बनाए रखना।

महाभारत और रामायण में दिखाया गया है कि राज्य की नीति उसके शासक के चरित्र पर निर्भर करती है। राजा का स्वभाव, उसका आत्मसंयम और नैतिकता बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।

मानव की कमजोरियाँ—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और ईर्ष्या—राजनीति को भी प्रभावित करती हैं। इसलिए भारतीय शास्त्रों में आत्मसंयम पर जोर दिया गया है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है—
“इन्द्रियजयाज्ज्ञानवृद्धिः।”
अर्थात् इन्द्रियों पर नियंत्रण के बिना सही निर्णय नहीं लिए जा सकते।

भारतीय परंपरा में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक सिद्धांत हैं—जैसे षाड्गुण्य नीति, उपायचतुष्टय और मंडल सिद्धांत। षाड्गुण्य नीति में संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभाव जैसे विकल्प होते हैं, जिनसे राज्य अपनी नीति तय करता है। उपायचतुष्टय—साम, दाम, दंड और भेद—राजनीतिक व्यवहार के प्रमुख तरीके हैं।

मंडल सिद्धांत के अनुसार पड़ोसी राज्य संभावित शत्रु हो सकता है, जबकि उसका पड़ोसी संभावित मित्र हो सकता है। यह विचार आज भी उपयोगी है।

भारतीय परंपरा नैतिकता पर भी जोर देती है। अर्थशास्त्र में कहा गया है—
“प्रजासुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्।”
यानी प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है।

यदि इस सोच को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जाए, तो दुनिया का लक्ष्य केवल शक्ति संतुलन नहीं, बल्कि सबका कल्याण होना चाहिए।

आज दुनिया एकध्रुवीय से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। ऐसे में अलग-अलग सभ्यताओं के विचारों का महत्व बढ़ रहा है। अब जरूरत है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को केवल पश्चिमी नजरिए से नहीं, बल्कि व्यापक दृष्टिकोण से समझा जाए।

भारत की परंपरा इसमें एक मजबूत आधार देती है। कौटिल्य की रणनीति, भीष्म की नैतिकता और श्रीकृष्ण की लोकसंग्रह की सोच आज भी प्रासंगिक है।

आज की दुनिया नई चुनौतियों का सामना कर रही है—जैसे साइबर युद्ध, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक असमानता। इनका समाधान केवल शक्ति-राजनीति से संभव नहीं है, बल्कि नैतिक दृष्टिकोण भी जरूरी है।

भारतीय परंपरा हमें सिखाती है कि असली शक्ति केवल सैन्य या आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व में होती है।

यदि दुनिया को शांति और स्थिरता चाहिए, तो उसे शक्ति के साथ-साथ धर्म और लोकसंग्रह को भी अपनाना होगा।

भारतीय परंपरा का संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है—
“यतो धर्मस्ततो जयः।”
अर्थात् जहाँ धर्म है, वहीं जीत है।