उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव से पहले हलचल तेज हो गई है। डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रपौत्र राजरतन अंबेडकर ने अखिलेश यादव से मुलाकात की है। यह मुलाकात लखनऊ में समाजवादी पार्टी के दफ्तर में आयोजित ईद मिलन समारोह के दौरान हुई। इस दौरान राजरतन अंबेडकर ने अखिलेश यादव के प्रति अपना समर्थन जताया और एक नया नारा भी दिया “मिले अंबेडकर और अखिलेश, खुल जाएंगे साधुओं के भेष।” इस नारे के बाद प्रदेश की राजनीति में चर्चा और भी तेज हो गई है।
राजरतन अंबेडकर ने कहा कि अखिलेश यादव “PDA” (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के जरिए समाज के अलग-अलग वर्गों को जोड़ने का काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर वह इस अभियान का छोटा सा हिस्सा भी बन पाए, तो उन्हें गर्व होगा कि वह संविधान को बचाने की लड़ाई में शामिल रहे। उन्होंने कार्यक्रम के दौरान यह भी कहा कि देशभर में ऐसे ईद मिलन और सामाजिक कार्यक्रम होने चाहिए, जहां लोग मिलकर एकता का संदेश दें। उनके अनुसार, इससे समाज में विभाजन फैलाने वाली ताकतों को जवाब मिलेगा और यह साबित होगा कि भारत के लोग एक हैं।
राजरतन अंबेडकर बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया के नेशनल प्रेसीडेंट भी हैं। उनकी समाजवादी पार्टी के साथ नजदीकी को राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है। खासकर दलित वोट बैंक पर इसका असर पड़ सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अखिलेश यादव इस रणनीति के जरिए दलित और पिछड़े वर्गों को एक मंच पर लाना चाहते हैं। अगर वह बहुजन समाज पार्टी के पारंपरिक दलित वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल होते हैं, तो आगामी विधानसभा चुनाव में उन्हें बड़ा फायदा मिल सकता है।
इस मुलाकात से एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की गई है कि पिछड़े और दलित समुदाय एकजुट हो सकते हैं। यह गठजोड़ उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई दिशा दे सकता है। कुल मिलाकर, राजरतन अंबेडकर और अखिलेश यादव का एक साथ आना सिर्फ एक मुलाकात नहीं, बल्कि चुनाव से पहले एक मजबूत राजनीतिक संकेत माना जा रहा है, जिसका असर आने वाले समय में साफ दिखाई दे सकता है।