फिर क्यों चर्चा में आई कोलकाता की आयकॉनिक राइटर्स बिल्डिंग?

Date: 2026-05-08
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पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने जिस ऐतिहासिक बिल्डिंग को वामपंथी दौर का प्रतीक मानते हुए त्याग दिया था उसी आयकॉनिक राइटर्स बिल्डिंग के दिन अब फिरने के संकेत हैं। राज्य में बनने जा रही  बीजेपी की नई सरकार ऐतिहासिक राइटर्स बिल्डिंग को फिर से सत्ता के केंद्र में लाने की तैयारी में है।

साल 2011 में ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद इसे वामपंथी दौर का प्रतीक मानते हुए प्रशासनिक कामकाज से अलग कर दिया गया और नया सचिवालय ‘नबान्न’ में स्थानांतरित कर दिया गया। प्रत्यक्ष तौर पर ऐसा मरम्मत का बहाना बनाकर किया गया। अब जब सत्ता बदली है, तो भाजपा सरकार नबान्न की जगह फिर से राइटर्स बिल्डिंग में जा सकती है।

Writers Building  तीन शताब्दियों से बंगाल की सत्ता, संघर्ष और राजनीतिक विरासत का प्रतीक रही है। लाल रंग की यह बिल्डिंग लंबे समय तक ईस्ट इंडिया कंपनी का यह मुख्यालय रहा और आजादी के बाद बंगाल सरकार के सचिवालय के रूप में तब्दील हो गया। माना जा रहा है कि अब बीजेपी इस ऐतिहासिक भवन को पुनर्जीवित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। चुनाव परिणाम के बाद इसकी साफ-सफाई और प्रारंभिक निरीक्षण शुरू हो चुका है।

प्रतीकों की सम्मानजनक वापसी

शुरुआत में सीएम कार्यालय समेत कुछ प्रमुख विभागों को यहां स्थानांतरित करने पर विचार हो रहा है। यदि भाजपा इस पर आगे बढ़ती है तो न केवल ऐतिहासिक इमारत का पुनरुद्धार होगा, बल्कि बंगाल की राजनीति में इतिहास के सहारे भविष्य गढ़ने की रणनीति का उदाहरण भी बन सकता है।

इस कदम को राजनीतिक रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। भाजपा बंगाल में अपनी जड़ों को मजबूत करने के लिए इतिहास और सांस्कृतिक प्रतीकों के सहारे नया नैरेटिव गढ़ना चाहती है। राइटर्स बिल्डिंग के जरिये संदेश देने की कोशिश होगी कि सत्ता परिवर्तन केवल सरकार का नहीं, बल्कि प्रशासनिक परंपराओं और प्रतीकों की भी सम्मानजनक वापसी है। 

राइटर्स नाम क्यों पड़ा?

राइटर्स बिल्डिंग को ईस्ट इंडिया कंपनी के उन कर्मचारियों के लिए बनाया गया था, जिन्हें ‘राइटर्स’ कहा जाता था। बाद में यह प्रशासनिक शक्ति का केंद्र बन गया। 150 मीटर लंबी और 55 हजार वर्गफीट में फैली यह इमारत टेराकोटा ईंटों से बनी है और अपने विशिष्ट स्थापत्य के लिए जानी जाती है।भवन कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बिनय बसु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने यहीं ब्रिटिश अधिकारी सिम्पसन की हत्या कर औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी थी। बाद में इन्हीं तीनों के नाम पर डलहौजी स्क्वायर का नाम बदलकर बीबीडी बाग रखा गया।

16 करोड़ की लागत से लौट सकता है गौरव

राइटर्स बिल्डिंग की मरम्मत के लिए पश्चिम बंगाल की सरकार ने अध्ययन का काम जाधवपुर विश्वविद्यालय को सौंपा था, जिसके माध्यम से कोटेक्स कंपनी ने इसे पूरा किया।इसकी रिपोर्ट में बताया गया कि थोड़ी मरम्मत, वाटरप्रूफिंग और संरचनात्मक मजबूती के बाद भवन से सचिवालय का काम संचालित किया जा सकता है। इस पर 16 करोड़ की लागत आएगी। लेकिन वाम दलों से बदले की भावना के तहत सरकार ने रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

बिल्डिंग की कमियां

रिपोर्ट में कहा गया है कि भवन उपयोग के लायक है। सारे हिस्से सामान्य भार वहन करने में सक्षम हैं। हालांकि कुछ समस्याएं हैं। जैसे कारिडोर में पत्थर की स्लैब को आरसीसी स्लैब से बदलने के कारण दरारें आई हैं। रिसाव, नमी, प्लास्टर क्षति और पुराने एवं नए निर्माण के असंगत मेल से संरचना पर दबाव है। भूकंपीय दृष्टि से बड़े हाल की छतों को हल्का संवेदनशील बताया गया है, जिसे मरम्मत कर ठीक किया जा सकता है।

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