Politics over liquor ban in Bihar: क्या बदलेगी नीति या कायम रहेगा सामाजिक सुधार का मॉडल?

Authored By: News Corridors Desk | 18 Apr 2026, 03:48 PM
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बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। लंबे समय तक इस नीति का चेहरा रहे नीतीश कुमार अब मुख्यमंत्री पद पर नहीं हैं, जिसके बाद यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या नई सरकार इस कानून में बदलाव करेगी। कई राजनीतिक बयान और अटकलें इस ओर इशारा कर रही थीं कि शराबबंदी खत्म हो सकती है, लेकिन हालिया बयान में सम्राट चौधरी  ने साफ कर दिया है कि फिलहाल सरकार इस कानून को खत्म करने के मूड में नहीं है। इसके बावजूद, यह मुद्दा अब भी राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बना हुआ है।

शराबबंदी केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि इसे सामाजिक सुधार के बड़े कदम के रूप में देखा गया था। बिहार में इसे लागू करने के पीछे महिलाओं की बड़ी भूमिका रही। कई परिवारों में शराब की वजह से आर्थिक तंगी, घरेलू हिंसा और सामाजिक अस्थिरता बढ़ रही थी। ऐसे में महिलाओं की मांग और जनसुनवाई के बाद नीतीश कुमार ने यह कड़ा फैसला लिया। लागू होने के बाद कई रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया कि घरेलू हिंसा, अपराध और सड़क दुर्घटनाओं में कमी आई है, जिससे यह नीति समाज के एक बड़े वर्ग के लिए राहत लेकर आई।

हालांकि, शराबबंदी के विरोध में भी मजबूत तर्क दिए जाते रहे हैं। सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक नुकसान का है। खुद सम्राट चौधरी पहले यह स्वीकार कर चुके हैं कि इस कानून के कारण बिहार को हर साल लगभग 28,000 से 30,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होता है। यह उस राज्य के लिए बड़ी रकम है, जिसका कुल राजस्व ही सीमित है। इसके अलावा, आलोचकों का कहना है कि कानून के बावजूद अवैध शराब का कारोबार जारी है और होम डिलीवरी जैसे मामलों की खबरें भी सामने आती रहती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस कानून की प्रभावशीलता उतनी है, जितनी अपेक्षित थी।

इस बहस के बीच नीतीश कुमार का पुराना तर्क भी चर्चा में है। उन्होंने साफ कहा था कि अगर चोरी-छिपे शराब पीने की घटनाएं होती हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि कानून को खत्म कर दिया जाए। उनका कहना था कि देश में कई अपराधों के खिलाफ कानून हैं, लेकिन वे पूरी तरह खत्म नहीं हुए—फिर भी कानून बनाए रखना जरूरी है। उनके अनुसार समस्या कानून में नहीं, बल्कि उसे तोड़ने वालों में है। यही सोच शराबबंदी के समर्थकों को अब भी मजबूत आधार देती है।

वहीं नई सरकार का रुख फिलहाल संतुलित नजर आता है। एक तरफ सम्राट चौधरी ने साफ किया है कि शराबबंदी जारी रहेगी और यह समाज के हित में लिया गया फैसला है, जिसकी तारीफ Narendra Modi भी कर चुके हैं। दूसरी तरफ, उन्होंने आर्थिक नुकसान की वास्तविकता को भी स्वीकार किया है। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार फिलहाल कानून को बनाए रखने के पक्ष में है, लेकिन भविष्य में इसमें कुछ बदलाव या सुधार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

नई सरकार ने अपने व्यापक विजन में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस, बड़े निवेश को आकर्षित करने, शिक्षा व्यवस्था सुधारने और प्रशासनिक निगरानी को मजबूत करने जैसे लक्ष्य भी रखे हैं। ऐसे में शराबबंदी का मुद्दा केवल कानून तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, आर्थिक संतुलन और राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार सामाजिक सुधार को प्राथमिकता देती है या आर्थिक दबावों के चलते नीति में बदलाव करती है। फिलहाल इतना साफ है कि शराबबंदी बिहार की राजनीति और समाज—दोनों के लिए एक संवेदनशील और निर्णायक मुद्दा बनी हुई है।