मध्य-पूर्व का इलाका दुनिया की राजनीति में हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। यहाँ तेल के बड़े भंडार हैं और कई ऐसे देश हैं जिनका वैश्विक राजनीति पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। इन्हीं देशों में दो प्रमुख शक्तियाँ हैं— सऊदी अरब और ईरान। इन दोनों देशों के बीच कई दशकों से तनाव और दुश्मनी चली आ रही है। जब भी इस क्षेत्र में कोई बड़ा संकट होता है, अक्सर उसके पीछे इन दोनों देशों की प्रतिद्वंद्विता दिखाई देती है। हाल के वर्षों में कई बार ऐसा हुआ है कि ईरान समर्थित समूहों पर सऊदी अरब या अमेरिकी ठिकानों पर हमले करने के आरोप लगे हैं। वहीं सऊदी अरब भी ईरान पर क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाता रहा है। इन घटनाओं के कारण दुनिया भर में यह सवाल उठता है कि आखिर इन दोनों देशों के बीच इतनी गहरी दुश्मनी क्यों है। सच यह है कि यह संघर्ष केवल धर्म का नहीं है। इसके पीछे राजनीति, शक्ति संतुलन, अर्थव्यवस्था, तेल और अंतरराष्ट्रीय गठबंधन जैसे कई कारण हैं।
धार्मिक मतभेद: शिया और सुन्नी का मुद्दा
सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव का एक कारण धार्मिक मतभेद भी है। इस्लाम के दो मुख्य संप्रदाय हैं—सुन्नी और शिया। दुनिया के अधिकतर मुसलमान सुन्नी हैं, जबकि शिया मुसलमानों की संख्या कम है। सऊदी अरब खुद को सुन्नी इस्लाम का प्रमुख केंद्र मानता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस्लाम के दो सबसे पवित्र शहर— Mecca और Medina—सऊदी अरब में ही स्थित हैं। हर साल लाखों मुसलमान यहाँ हज और उमराह करने आते हैं। दूसरी ओर ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया मुस्लिम देश है। वहाँ की सरकार और धार्मिक नेतृत्व खुद को शिया मुसलमानों का संरक्षक मानते हैं। इस कारण कई बार ऐसा लगता है कि दोनों देश धार्मिक नेतृत्व के लिए भी प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। हालाँकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि शिया-सुन्नी विवाद असली कारण नहीं है, बल्कि इसे राजनीतिक उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।
1979 की ईरानी क्रांति: संबंधों में बड़ा बदलाव
सऊदी अरब और ईरान के रिश्तों में सबसे बड़ा बदलाव 1979 में आया। इस साल ईरान में एक बड़ी राजनीतिक क्रांति हुई जिसे ईरानी क्रांति कहा जाता है। इस क्रांति से पहले ईरान में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की राजशाही थी। उस समय ईरान के अमेरिका और पश्चिमी देशों से अच्छे संबंध थे। लेकिन क्रांति के बाद शाह को सत्ता से हटा दिया गया और धार्मिक नेता रुहोल्लाह खुमैनी सत्ता में आए। नई सरकार ने खुद को “इस्लामिक रिपब्लिक” घोषित किया और राजशाही व्यवस्था का विरोध किया। खुमैनी का कहना था कि इस्लाम में राजाओं के लिए कोई जगह नहीं है। यह बात सऊदी अरब के शाही परिवार के लिए चिंता का कारण बन गई, क्योंकि वहाँ भी राजशाही शासन है। सऊदी नेतृत्व को डर था कि ईरान की क्रांतिकारी विचारधारा दूसरे देशों में भी फैल सकती है। इसी के बाद से दोनों देशों के बीच अविश्वास और बढ़ गया।
प्रॉक्सी वॉर: दूसरे देशों में लड़ाई
सऊदी अरब और ईरान ने अब तक सीधे एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध नहीं लड़ा है। लेकिन वे अक्सर दूसरे देशों में अपने समर्थक समूहों के माध्यम से लड़ाई लड़ते हैं। इसे “प्रॉक्सी वॉर” कहा जाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यमन में देखा जाता है। वहाँ सऊदी अरब सरकार का समर्थन करता है, जबकि ईरान पर आरोप है कि वह हूती विद्रोहियों की मदद करता है। इस संघर्ष के कारण यमन में भारी तबाही हुई और लाखों लोग मानवीय संकट का सामना कर रहे हैं। इसी तरह सीरिया में भी दोनों देशों के हित टकराते हैं। ईरान वहाँ के राष्ट्रपति बशर अल असद का समर्थन करता है, जबकि सऊदी अरब ने कई विद्रोही समूहों का समर्थन किया। इसके अलावा लेबनान और इराक की राजनीति में भी इन दोनों देशों का प्रभाव देखा जाता है। इन देशों में अलग-अलग गुटों को समर्थन देकर दोनों देश अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश करते हैं।
अमेरिका और इजराइल का प्रभाव
इस संघर्ष में बाहरी शक्तियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सऊदी अरब लंबे समय से United States का करीबी सहयोगी रहा है। अमेरिका और सऊदी अरब के बीच रक्षा, व्यापार और ऊर्जा के क्षेत्र में गहरे संबंध हैं। अमेरिका सऊदी अरब को आधुनिक हथियार देता है और बदले में उसे रणनीतिक सहयोग मिलता है। दूसरी ओर ईरान और अमेरिका के संबंध 1979 की क्रांति के बाद से काफी खराब हैं। अमेरिका ने ईरान पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं और उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी चिंता जताई है। इस पूरे समीकरण में Israel भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ईरान इजराइल को अपना बड़ा दुश्मन मानता है और उसके खिलाफ कई बार कड़े बयान देता है। इसी कारण सऊदी अरब और इजराइल के बीच हाल के वर्षों में कुछ हद तक नजदीकियां बढ़ी हैं, क्योंकि दोनों की चिंता ईरान को लेकर है।
तेल और आर्थिक प्रतिस्पर्धा
सऊदी अरब और ईरान दोनों ही दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल हैं। इसलिए वैश्विक तेल बाजार में भी उनके बीच प्रतिस्पर्धा रहती है। सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में से एक है और वह चाहता है कि तेल बाजार में उसकी स्थिति मजबूत बनी रहे। दूसरी तरफ ईरान भी अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए अधिक से अधिक तेल बेचना चाहता है। जब ईरान पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगते हैं, तो उसकी तेल बिक्री कम हो जाती है और इससे सऊदी अरब को फायदा होता है। लेकिन जैसे ही ईरान बाजार में वापस आने की कोशिश करता है, तो तेल की कीमतों और बाजार हिस्सेदारी को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ सकता है।
क्या दोनों देशों के बीच शांति संभव है?
हाल के वर्षों में कुछ सकारात्मक कदम भी उठाए गए हैं। मार्च 2023 में चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ। इस समझौते के तहत दोनों देशों ने अपने राजनयिक संबंध बहाल करने और दूतावास फिर से खोलने का फैसला किया। यह कदम मध्य-पूर्व में शांति के लिए महत्वपूर्ण माना गया। लेकिन दोनों देशों के बीच कई दशकों से जमा अविश्वास को खत्म करना आसान नहीं है। यमन, सीरिया और अन्य क्षेत्रों में अभी भी दोनों देशों के हित अलग-अलग हैं। इसके अलावा अमेरिका, इजराइल और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों की भूमिका भी इस पूरे समीकरण को जटिल बनाती है।