दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेताओं और भारत निर्वाचन आयोग के बीच हुई एक अहम बैठक अब विवादों में आ गई है। यह बैठक पश्चिम बंगाल के आगामी चुनावों को लेकर बुलाई गई थी, लेकिन बातचीत के दौरान माहौल काफी गर्म हो गया। TMC का एक प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंचा था। इस डेलिगेशन में डेरेक ओ'ब्रायन और सागरिका घोष जैसे नेता शामिल थे। इन नेताओं ने आयोग के सामने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने (SIR प्रक्रिया) का मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि बड़ी संख्या में लोगों के नाम बिना सही वजह के हटा दिए गए हैं, जिससे चुनाव प्रभावित हो सकता है।
बैठक के दौरान क्या हुआ, इसको लेकर दोनों पक्षों की अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं। चुनाव आयोग के के मुताबिक, मीटिंग के दौरान काफी गहमागहमी हुई। आरोप है कि डेरेक ओ'ब्रायन ने गुस्से में आवाज ऊंची कर दी और मुख्य चुनाव आयुक्त से कुछ न बोलने तक की बात कह दी। हालांकि, टीएमसी की तरफ से इस पर अलग नजरिया रखा जा रहा है। मीटिंग के बाद टीएमसी नेताओं ने मीडिया से बात करते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि उन्होंने आयोग को पहले 9 चिट्ठियां लिखी थीं और 6 उदाहरण भी दिए थे, लेकिन उनकी किसी भी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। उनका कहना था कि वे सिर्फ अपनी बात रखने गए थे, लेकिन उन्हें सही से सुना ही नहीं गया।
टीएमसी नेताओं का यह भी आरोप है कि पूरी बैठक केवल 7 मिनट ही चली। उनका कहना है कि इतनी महत्वपूर्ण समस्या पर इतनी कम समय में चर्चा करना ठीक नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मीटिंग खत्म होते ही उन्हें “यहां से निकल जाओ” तक कहा गया, जो एक संवैधानिक संस्था के लिए उचित व्यवहार नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने साफ शब्दों में अपना रुख जाहिर किया। आयोग ने TMC को दो टूक कहा कि पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष होंगे। आयोग के अनुसार चुनाव प्रक्रिया भय, हिंसा, धमकी, प्रलोभन, छापेमारी और किसी भी तरह की गड़बड़ी से मुक्त रखी जाएगी। यानी इस बार चुनाव में किसी भी तरह की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इस पूरे विवाद के बीच एक बड़ा मुद्दा मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का है। जानकारी के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के तहत 90.83 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। इससे राज्य की कुल वोटर संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.77 करोड़ रह गई है। सबसे ज्यादा नाम कुछ खास जिलों में हटाए गए हैं, जिनमें उत्तर और दक्षिण 24 परगना, मुर्शिदाबाद, नदिया, मालदा, हुगली, हावड़ा, उत्तर दिनाजपुर और पूर्व बर्धमान शामिल हैं। इन जिलों में कुल मिलाकर लगभग 66.6 लाख नाम हटाए गए हैं, जो कुल हटाए गए नामों का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा है। खास बात यह है कि इन जिलों में राज्य की 294 में से 178 विधानसभा सीटें आती हैं, इसलिए इसका सीधा असर चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है।
इस मुद्दे को लेकर टीएमसी काफी आक्रामक नजर आ रही है। पार्टी का कहना है कि यह सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश भी हो सकती है। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत और पारदर्शी तरीके से की जा रही है। अब इस मामले ने राजनीतिक रूप ले लिया है। विपक्षी पार्टियां भी इस मुद्दे पर सक्रिय हो गई हैं। जानकारी के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए नोटिस लोकसभा और राज्यसभा में दिए गए हैं। इस मुद्दे पर सभी विपक्षी दल एकजुट होकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की भी तैयारी में हैं।
पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले ही माहौल काफी गर्म हो गया है। एक तरफ चुनाव आयोग निष्पक्षता का भरोसा दे रहा है, तो दूसरी तरफ टीएमसी जैसे बड़े दल चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और बढ़ सकता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चुनाव आयोग सभी पक्षों का भरोसा जीत पाएगा, या यह मुद्दा चुनावी राजनीति का बड़ा हथियार बन जाएगा।