1 मार्च को सुबह 3:07 बजे (भारतीय समयानुसार) अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए लिखा कि “इतिहास के सबसे क्रूर लोगों में से एक, खामेनेई की मृत्यु हो गई है।” इसके कुछ समय बाद ईरान की सरकारी मीडिया ने भी पुष्टि की कि देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का निधन हो गया है। रिपोर्टों के अनुसार, यह घटना ऐसे समय में हुई जब अमेरिका और इज़राइल के बीच तनाव बढ़ा हुआ था और ईरान पर हमलों की खबरें आ रही थीं।
86 वर्षीय खामेनेई 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता थे। वे ईरान की धर्मतांत्रिक (धार्मिक शासन वाली) व्यवस्था के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माने जाते थे। उनके पास सेना, न्यायपालिका और कई बड़े फैसलों की अंतिम शक्ति थी। उनके निधन को ईरान की राजनीति में एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है।
खामेनेई का राजनीतिक जीवन काफी लंबा और विवादों से भरा रहा। उन्होंने अपने कार्यकाल में छह राष्ट्रपतियों के साथ काम किया। इनमें कुछ नेता अपेक्षाकृत उदार विचारों वाले भी थे, लेकिन खामेनेई खुद हमेशा सख्त और कट्टर रुख अपनाते रहे। अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर उनका नजरिया बेहद कठोर था। वे मानते थे कि अमेरिका के साथ बातचीत से ईरान को कोई फायदा नहीं होगा। पिछले वर्षों में जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ा, तब भी उन्होंने साफ कहा था कि अमेरिका के साथ बातचीत न तो तर्कसंगत है, न समझदारी भरी और न ही सम्मानजनक। उन्होंने यह चेतावनी भी दी थी कि अगर ईरान पर हमला हुआ तो इससे पूरे मध्य पूर्व में बड़ा युद्ध छिड़ सकता है।
अपने शासन के दौरान खामेनेई को कई बार देश के अंदर विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा। 1999 में छात्र आंदोलन हुआ। 2009 में राष्ट्रपति चुनावों को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। 2019 में भी सरकार के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे। हाल ही में “महिला, जीवन, स्वतंत्रता” आंदोलन ने भी अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा। यह आंदोलन महसा अमिनी नाम की एक कुर्द महिला की हिरासत में मौत के बाद शुरू हुआ था। उन पर सख्त ड्रेस कोड का उल्लंघन करने का आरोप था। इन सभी आंदोलनों को सरकार ने सख्ती से दबाया और कई लोगों की जान गई। खामेनेई अक्सर इन प्रदर्शनों को विदेशी ताकतों का असर बताते थे। उनका कहना था कि पश्चिमी देश ईरान को अस्थिर करना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने सुरक्षा बलों को सख्त कार्रवाई की खुली छूट दी।
अगर उनके शुरुआती जीवन की बात करें तो खामेनेई ईरान की इस्लामी क्रांति के प्रमुख चेहरों में से एक थे। इस क्रांति ने शाह मोहम्मद रजा पहलवी के शासन को खत्म कर दिया था। खामेनेई, रुहोल्लाह खुमैनी के करीबी सहयोगी थे। खुमैनी ईरान के पहले सर्वोच्च नेता बने। खुमैनी की 1989 में मृत्यु के बाद नए सर्वोच्च नेता के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई। ईरान के संविधान के अनुसार, विशेषज्ञों की सभा नाम का एक धार्मिक समूह सर्वोच्च नेता का चुनाव करता है। शुरुआत में खामेनेई इस पद के लिए सबसे पसंदीदा उम्मीदवार नहीं माने जा रहे थे। लेकिन बाद में उन्हें इस पद के लिए चुना गया। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि उन्होंने खुद को इस पद के योग्य नहीं बताया था, लेकिन अंत में वे ही सर्वोच्च नेता बने।
खामेनेई के जीवन में एक बड़ा हादसा 1981 में हुआ था। उस समय वे राष्ट्रपति थे। एक मस्जिद में भाषण के दौरान उनके सामने रखा टेप रिकॉर्डर बम की तरह फट गया। इस हमले में वे गंभीर रूप से घायल हो गए। उनके दाहिने हाथ को स्थायी नुकसान पहुंचा और वह लकवाग्रस्त हो गया। हालांकि वे इस हमले से बच गए और बाद में देश के सर्वोच्च नेता बने। उनकी सुरक्षा हमेशा बेहद कड़ी रहती थी। कहा जाता है कि सर्वोच्च नेता बनने के बाद उन्होंने कभी देश से बाहर यात्रा नहीं की। उनकी अंतिम विदेश यात्रा 1989 में राष्ट्रपति के रूप में उत्तर कोरिया की थी।
अब उनके निधन के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि ईरान का अगला सर्वोच्च नेता कौन होगा। देश में शोक का माहौल है और आगे की राजनीतिक दिशा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दिनों में ईरान की नीतियों और मध्य पूर्व की स्थिति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। खामेनेई का जीवन संघर्ष, शक्ति और विवादों से भरा रहा। उनके समर्थक उन्हें दृढ़ नेता मानते थे, जबकि आलोचक उन्हें कठोर और दमनकारी शासक कहते थे। उनके निधन के साथ ही ईरान की राजनीति का एक लंबा अध्याय समाप्त हो गया है, लेकिन इसके बाद की कहानी अब शुरू होने वाली है।