अंबेडकर जयंती के बीच यूपी की राजनीति में ‘रंग की लड़ाई’ तेज। मायावती ने सपा पर दलित वोटरों को भ्रमित करने का आरोप लगाया।
नीले गमछे को लेकर छिड़ी सियासी बहस
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों ‘नीले रंग’ को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav द्वारा नीले गमछे और प्रतीकों के इस्तेमाल पर बसपा सुप्रीमो Mayawati ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। लखनऊ में मीडिया से बातचीत के दौरान मायावती ने बिना नाम लिए विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि केवल नीले रंग का इस्तेमाल करने से कोई दलितों का सच्चा प्रतिनिधि नहीं बन सकता।
‘नकल से नहीं बनेगा भरोसा’ मायावती का संदेश, दलित वोटरों को गुमराह करने का आरोप
मायावती ने सपा के इस कदम को एक राजनीतिक रणनीति बताते हुए कहा कि यह दलित समाज को भ्रमित करने की कोशिश है। उन्होंने आरोप लगाया कि जो दल पहले दलित हितों के खिलाफ रहे हैं, वे अब सिर्फ प्रतीकों के जरिए खुद को दलित समर्थक दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। उनके मुताबिक, केवल नीले झंडे या गमछे अपनाने से वास्तविक जुड़ाव नहीं बनता।
सपा की PDA रणनीति और ‘नीले रंग’ का इस्तेमाल, पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक समीकरण साधने की कोशिश
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, Akhilesh Yadav हाल के दिनों में ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के तहत नई रणनीति पर काम कर रहे हैं। रैलियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में नीले गमछे और प्रतीकों का इस्तेमाल इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिससे दलित वोट बैंक के साथ जुड़ाव मजबूत किया जा सके। मायावती ने कहा कि नीला रंग बहुजन आंदोलन और बसपा की विचारधारा से गहराई से जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि अन्य दलों द्वारा इस रंग को अपनाना दरअसल बसपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश है। उन्होंने कार्यकर्ताओं को सतर्क रहने की सलाह देते हुए इसे एक बड़ी राजनीतिक साजिश करार दिया।
2027 चुनाव से पहले बढ़ी सियासी गर्मी, दलित वोट बैंक पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा
राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए राजनीतिक दलों के बीच दलित वोट बैंक को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। मायावती की प्रतिक्रिया को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है, जहां बसपा अपनी पारंपरिक पहचान और समर्थन आधार को बचाने की कोशिश में है, जबकि सपा नए सामाजिक समीकरण बनाने में जुटी है। नीले गमछे को लेकर शुरू हुआ यह विवाद सिर्फ रंग की बहस नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत है। एक ओर सपा नई रणनीति के जरिए अपने आधार को बढ़ाना चाहती है, तो दूसरी ओर बसपा अपनी पहचान और वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए आक्रामक रुख अपनाए हुए है।